ऐ चाँद आसमां के क्यों तू इतना दूर है ,
मै तुमसे मिलना चाहता हूँ
पर ऐ दिल मजबूर है
अपलक निहारता हूँ वह मोहनी सूरत तेरी
क्या कुछ भी तरस आती नहीं
यह देखकर हालत मेरी ,
इस अखंड चितवन में मै चकोर बन गया हूँ
लखी कलि बिंदियो का मोर बन गया हूँ
बिरही के जख्म आखो का कोर बन गया हूँ
तेरे बिरह में पापिन कमजोर बन गया हूँ ,
मै पता लगाया अख़बार से गगन से
वे बेबसी सुनाकर आसा को तज रहे थे
कह रहे थे, ऐ कवी बिचारे
अब छोड़ दो तू जीना उस चाँद के सहारे
रह नहीं गई वह पबित्रता किरण में
चाँद सर्र्म खाता है महफिले गगन में
क्योंकि लोग उस पर चढ़ने उतरने लगे हैं.........................
दानवीर गौतम
Friday, August 27, 2010
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